Monday, 29 September 2025

29 September 2025

 नमस्ते दोस्तों,

आज 29 सितंबर 2025 है। रोज़ की तरह सुबह उठना कोई खास बात नहीं थी। मैं रात को देर तक जागा रहा, शायद दो बजे ही नींद आई। जब सुबह आख़िरकार आँख खुली, तो देखा – 7 बज चुके थे। तभी बीवी ने धीरे से आवाज़ दी, “सुनते हो, 7:15 हो गए हैं और आज आपको पूजा भी करनी है, उठ जाओ।”

मैंने मुँह मसलते हुए धीमे स्वर में कहा, “ठीक है।” आंखें धीरे-धीरे खोलते हुए मैं उठ गया। सबसे पहला काम – आटा गूँथना। आटे की महक और हाथों की मेहनत में ही समय बीत गया। आटा गूँथा और सब्ज़ी के लिए आलू काट दिए। तभी बीवी भी जाग गई और बोली, “आप लेट हो जाएंगे, तैयार हो जाओ, नहा-धोकर पूजा भी करनी है।”

मैं जल्दी से नहा-धोकर तैयार हुआ। तब तक बीवी ने टिफ़िन तैयार कर दिया था। मैं आलू-गोभी की सब्ज़ी और दही लेकर ऑफिस की ओर निकल पड़ा। नाश्ते में बीवी ने चाय और आधा पराठा खिला दिया था, जिससे भूख कुछ खास नहीं लगी।

मेरा ऑफिस मेरे घर से लगभग एक घंटे की दूरी पर है। बाइक पर गाने सुनते हुए और बीवी से बातें करते हुए मैं ऑफिस पहुँचा। ऑफिस पहुँचते ही वही काम शुरू किया, जो हमेशा करता आया हूँ – एक तरह का रोज़मर्रा का रूटीन, लेकिन हर दिन की कहानी अलग।

दोपहर में खाना खाया और थोड़ी बातचीत बीवी से की। अब बस समय का इंतज़ार है – कब 6 बजे का समय आए और दिन का यह सफ़र अपने अगले पड़ाव पर पहुंचे।

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कभी-कभी मन बहुत उदास हो जाता है

Jab

Jindagi aise bhag rhi hai ki kab din aur kab rat gujar jate hai pata hi nhi chalta . sapne , ye ek aisa shabd h ki ab to dekhne se bhi mano ek dar sak lagta ho. Jane kitne hi aise sapne h jo ap shayad kabhi poore bhi nah o . ek bhut maje ki bat btata hu shayad apko bhi use sunkar hasin na aa jaye. Me jab chota tha to mere bhi bhut sare sapne the ki bada ghar hoga gadi hogi naukar honge aur aaj yahan job hi bhut muskil se ho pa rhi hman to krta h bhut kuch likhu apne jeevan ke sare experience ke bare me linkhu lekin kahan se start kru samjh nhi aata . aankho ke samne log mere aaj

 

कभी-कभी मन बहुत उदास हो जाता है। समझ ही नहीं आता कि कैसी प्रतिक्रिया दूँ, क्या करूँ। मेरे साथ भी इस समय ऐसी ही स्थिति है। कई बार मन में विचार आता है कि सब से अलग होकर अपनी ही एक दुनिया बसा लूँजहाँ कोई रिश्तेदार हो और ही कोई जानने वाला।

मैं देखता हूँ कि आजकल अपनों से ज़्यादा, पराये लोग बिना किसी स्वार्थ के सहारा दे देते हैं। सोचता हूँ कि रिश्ता आखिर होता क्या है? क्या लोग आजकल रिश्तों का महत्व भूल गए हैं या रिश्ते केवल नाम भर के रह गए हैं?

समाज में अहंकार की भावना इतनी बढ़ गई है कि हर कोई लड़ने को तैयार रहता है, पर झुकना किसी को स्वीकार नहीं। मुझे ऐसा समाज बिल्कुल पसंद नहीं, जहाँ चारों ओर सिर्फ़ स्वार्थी लोग हों। रिश्तों की खोखली दिखावेबाज़ी से समाज भरा पड़ा है। यहाँ लोग दूसरों की तरक्की देखकर जलने लगते हैं।"

 


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